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Dr. Yogesh Vyas

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Vastu Consultancy

वास्तुशास्त्र भारत का अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है। प्राचीन काल में वास्तुकला सभी कलाओं की जननी कही जाती थी। आज भी जितने भवन और बिल्डिंग आदि बन रही है अधिकांश में वास्तु के हिसाब से बनाया जा रहा है।

आइये जानते है वास्तु के कुछ नियम :-
वास्तु शास्त्र तीन प्रकार के होते हैं –
• वास्तु शास्त्र आवासीय – मकान एवं फ्लैट
• वास्तु शास्त्र व्यावसायिक -व्यापारिक एवं औद्योगिक
• वास्तु शास्त्र धार्मिक- धर्मशाला, जलाशय एवं धार्मिक संस्थान।

वास्तु में भूमि का विशेष महत्व है। भूमि चयन करते समय भूमि या मिट्टी की गुणवत्ता का विचार कर लेना चाहिए। भूमि परीक्षण के लिये भूखंड के मध्य में भूस्वामी के हाथ के बराबर एक हाथ गहरा, एक हाथ लंबा एवं एक हाथ चौड़ा गड्ढा खोदकर उसमें से मिट्टी निकालने के पश्चात् उसी मिट्टी को पुनः उस गड्ढे में भर देना चाहिए। ऐसा करने से यदि मिट्टी शेष रहे तो भूमि उत्तम, यदि पूरा भर जाये तो मध्यम और यदि कम पड़ जाये तो अधम अर्थात् हानिप्रद है। अधम भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार पहले के अनुसार नाप से गड्ढा खोद कर उसमें जल भरते हैं, यदि जल उसमें तत्काल शोषित न हो तो उत्तम और यदि तत्काल शोषित हो जाए तो समझें कि भूमि अधम है। भूमि के खुदाई में यदि हड्डी, कोयला इत्यादि मिले तो ऐसे भूमि पर भवन नहीं बनाना चाहिए।
यदि खुदाई में ईंट पत्थर निकले तो ऐसा भूमि लाभ देने वाला होता है। भूमि का परीक्षण बीज बोकर भी किया जाता है। जिस भूमि पर वनस्पति समय पर उगता हो और बीज समय पर अंकुरित होता हो तो वैसा भूमि उत्तम है। जिस भूखंड पर थके होकर व्यक्ति को बैठने से शांति मिलती हो तो वह भूमि भवन निर्माण करने योग्य है। वास्तु शास्त्र में भूमि के आकार पर भी विशेष ध्यान रखने को कहा गया है। वर्गाकार भूमि सर्वोत्तम, आयताकार भी शुभ होता है। इसके अतिरिक्त सिंह मुखी एवं गोमुखि भूखंड भी ठीक होता है। सिंह मुखी व्यावसायिक एवं गोमुखी आवासीय दृष्टि उपयोग के लिए ठीक होता है। किसी भी भवन में प्राकृतिक शक्तियों का प्रवाह दिशा के अनुसार होता है अतः यदि भवन सही दिशा में बना हो तो उस भवन में रहने वाला व्यक्ति प्राकृतिक शक्तियों का सही लाभ उठा सकेगा, किसकी भाग्य वृद्धि होगी।

किसी भी भवन में कक्षों का दिशाओं के अनुसार स्थान इस प्रकार होता है जैसे :-

• पूजा कक्ष – ईशान कोण
• स्नान घर – पूर्व
• रसोई घर – आग्नेय
• मुखिया का शयन कक्ष – दक्षिण, नैऋत्य कोण
• युवा दम्पति का शयन कक्ष – वायव्य कोण एवं उत्तर के बीच
• बच्चों का कक्ष – वायव्य एवं पश्चिम
• अतिरिक्त कक्ष – वायव्य
• भोजन कक्ष – पश्चिम
• अध्ययन कक्ष – पश्चिम एवं नैऋत्य कोण के बीच
• कोषागार – उत्तर
• स्टोर – नैऋत्य कोण
• जल कूप या बोरिंग – उत्तर दिशा या ईशान कोण
• सीढ़ी – नैऋत्य कोण
• जलकूप या बोरिंग – उत्तर दिशा या ईशान कोण
• शौचालय–पश्चिम या उत्तर-पश्चिम !
• अविवाहित (वायव्य) कन्याओं के लिये शयन कक्ष – वायव्य।


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